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अपराध

शहर के नज़दीक बसे एक छोटे से गाँव में कल रात एक बहुत बड़ी दुर्घटना घटी। एक ज़ख़्मी गाय, बीच सड़क पर रात भर तड़पती रही, लेकिन उसकी सहायता करने के लिए एक भी आदमी आगे नहीं आया, लेकिन जैसे ही उसकी मौत की ख़बर फैली, तो पुलिस, गाँव के सरपंच, ज़मींदार, सरकारी अफसर और यहाँ तक की शहर की राजनैतिक पार्टियों के कुछ लोग भी आ गए, उस गाय की हत्या का ढोल पीटने।
थोड़ी ही देर में पूरे इलाके में कर्फ्यू भी लग गया और गाँव से शहर जाती सड़क को बंद कर दिया गया। गाय के हत्यारे को पकड़ने के लिए पूरे गाँव में पूछताछ की गई। मुसलमानों के इलाके में तो पुलिस ने एक-एक घर में घुसकर तलाशी ली और ना जाने कितने बेगुनाह लोगों को शक की निगाह से देखते हुए डराया-धमकाया।

वहीं, किसी अति समझदार राजनैतिक पार्टी वाले ने, मौके का फायदा उठाते हुए, शहर के पार्टी ऑफिस में इस सनसनीखेज़ ख़बर की सूचना दे दी। और विपक्ष पार्टी पर, गाँव की शांति भंग करने और अन्य तीखी टिप्पड़ियों का प्रसारण करने के लिए मीडिया वालों को भी ख़बर कर दी।
अख़बारों और न्यूज़ चैनलों पर, “गौ हत्या के पीछे किसकी साज़िश थी? सरकार, गौ हत्या पर देश भर में बैन क्यों नहीं लगा देती? क्या जानवरों के प्रति हिंसा को सिर्फ गौ हत्या तक सीमित कर दिया जाए?” आदि विचारधाराओं पर गरमागरम बहस दिन भर चलती रही।
धर्म गुरु, राजनेता, राजनैतिक पार्टियां और जनता के अन्य शुभचिंतकों में गिने जाने वाले सैकड़ों लोगों को इस ख़बर से सुर्खियां बटोरने का अवसर मिला। देश भर में एक बार फिर असहिष्णुता का मुद्दा उठा, कई इलाकों में गौ हत्या के और नए मामले सामने आए और गाँव के नाज़ुक माहौल में दंगे पनपने का संकट तक आ गया।
कल तक जो एक आबाद गाँव था, वो एक ही दिन में बदल गया। सुनसान गलियों और बंद दुकानों से कोई गुज़रता तो उसे यह एहसास होता कि पूरा गाँव उस मासूम की हत्या का मातम मना रहा था। हालात कई दिन तक नहीं सुधरे और पुलिस भी अपनी खोजबीन में नाकाम रही। इसके बावजूद, एक बेकसूर को अपराधी मानकर उसे गिरफ़्तार कर लिया गया।

कुछ दिनों बाद जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई, तो उसमें साबित हुआ कि गाय की हत्या नहीं हुई थी, बल्कि उसकी मौत की वजह, एक जानवरों से जुड़ी बीमारी थी, जिसका शिकार होकर वह गाय, दूसरे जानवरों को भी उस बीमारी से संक्रमित कर सकती थी।
जेल में कैद उस बेगुनाह को जब बाहर निकाला गया तो उसे देखकर लगा कि कैद से बाहर आने वाला व्यक्ति इंसान नहीं बचा था, सिर्फ खून से लथपथ देह बची थी उसकी, भीतर का इंसान तो मर चुका था। कुछ दिनों तक उस बेगुनाह के परिवार वालों ने उसकी गिरफ़्तारी का विरोध किया, शहर के कुछ लोगों ने उसके लिए न्याय मांगने के लिए अदालत तक जाने का सोचा, पर फिर मामला अपने आप ठंडा पड़ गया।
इस डर से कि कहीं गौ हत्या के पाप की ग़लतफ़हमी में गाँव के लोग उस गरीब का बहिष्कार ना कर दें और पुलिस अधिकारी, समाज और धर्म के रक्षक उसे सज़ा-ए-मौत ना दे दें, राघव दूधवाला, अपने दूसरे जानवरों की हिफाज़त करने के लिए उस बीमार गाय को चुपचाप, गाँव से शहर को जाती सड़क पर छोड़ आया था। ताकि किसी को शक भी ना हो कि गाय उसकी है।

दुनिया तो उस गाय की मौत का सिर्फ दिखावा करती रही। असल तकलीफ, दर्द और अफ़सोस तो राघव दूध वाले की छोटी बेटी के हिस्से में रह गया था। रोज़ अपनी धन्नो रानी को प्यार से चारा खिलाती और उसके साथ अपने सुख-दुख की बातें करती, बच्ची उसे बेहद दुलार से रखती थी। गाय भी खुद को सिर्फ उसे ही छूने देती थी। वो बड़े प्यार से उसके बछड़ों को भी नहलाती और उनका ध्यान रखती थी।
जिस दिन गाँव के कन्या विद्यालय से घर लौटकर उसे अपनी गाय की मौत के बारे में पता चला, उस दिन वह खूब रोई और अपने बापू से भी लड़ पड़ी कि आखिर क्यों उन्होंने उस बीमार गाय को मरने के लिए अकेला और बेसहारा छोड़ दिया।

जब उसे इस बात का पता चला कि उसकी लाडली सखी की मौत पर बेवजह बवाल खड़ा किया गया, देश भर में झूठा शोक मनाया गया और कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए एक बेगुनाह पर गौ हत्या का झूठा इलज़ाम लगाकर उसे जानवरों की तरह मारा-पीटा, तो उसने इसे अपने देशवासियों का अपराध माना, जिसकी सज़ा ना जाने कौन तय करेगा।

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