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परंपरा

मेरी दादी माँ कभी स्कूल नहीं जा पाई, उनका विवाह महज 9 साल की उम्र में हो गया था, और फिर बड़ा परिवार था हमारा, तो उनका सारा वक़्त रसोई में ही बीतता था। इसलिए उनके पढ़ने लिखने का शौक अधूरा ही रह गया। पर मेरी माँ (दादी माँ को हम माँ ही कहते थे) ने बचपन में मुझे एक तोहफा दिया था, कहानियों का। पंचतंत की कहानियां, जातक कथाये, पौराणिक, ऐतिहासिक कहानियां और यही नहीं धार्मिक, शिक्षाप्रद साहित्य भी मुझे मेरी दादी माँ से विरासत में ही मिला। मेरे लिए शाम के वक़्त की, उनकी जुबान में बुनी वे कहानियां, आज भी जीवन की सबसे अनमोल यादो में से एक है।

माँ ने हम सब बहनो यानि उनकी पोटियों के लिए अनेक तरह के गहने बनवाये, अपने पुश्तैनी ज़ेवर सम्हाल कर रखे कि हर एक के लिए विवाह पर काम आये पर उनकी एक और अमानत थी, सबसे खास, उनके लिए भी और मेरे लिए भी, हमारी किताबें। माँ खुद पढ़ नहीं सकती थी पर उन्हें किताबे जमा करने का शौक था, और ख़ाली वक़्त में अक्सर मैं भी उन्हें किताब से कहानियाँ पढ़कर सुनाती थी. माँ के जाने के बाद फिर किताबों से दोस्ती हो गई मेरी और पढ़ते पढ़ते ही मैं लेखक बनने के सपने देखने लगी। अपनी पढ़ाई जारी रखी, जो मिला वह पढ़ती रही और साथ साथ छोटी बड़ी कहानियाँ, खत, निबंध लिखती रहती थी पर मुझे कभी आगे सफलता नहीं मिली, हमेशा निराशा और हार ही मिली।

जब दीवा मेरी ज़िन्दगी में आई तो मैं बहुत आगे बढ़ चुकी थी। बहुत कुछ बदल गया था ज़िन्दगी में, किताबों को भूल चुकी थी। अपनी नौकरी से खुश थी या नहीं, पता नहीं पर अपनी पहचान तो खो चुकी थी। लिखती रहती थी अपनी डायरी में बहुत कुछ, जो चुभता था हर पल मुझे, टूटे सपने और कुछ अधूरी कहानियां जिन्हें पूरा करने की हिम्मत खो दी थी मैंने। पर दीवा ने अपनी मासी के अंदर छिपा बचपन उसे लौटा दिया। वहीँ कहानियां जो माँ मुझे सुनाती थी, दीवा उन्ही कहानियों को मुझसे सुनने, जानने समझने की ज़िद करती। रोज़ नयी किताबे चाहिए होती उसको, एक दिन में सारी कहानियां पढने की ज़िद करती और मुझे मजबूर होकर सब काम छोड़कर उसे पढ़ाना पड़ता। तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि दीवा तो मेरी अपनी परछाई है। मैं भी तो जब छोटी थी तो पूरा दिन माँ के आगे पीछे दौड़कर कहानी सुनने की ज़िद करती थी और बचपन से लेकर आज तक सिर्फ एक ही चीज़ ऐसी है जिसके लिए मैं पागल हूँ, जिसके लिए मै पुरी ज़िन्दगी इंतज़ार कर सकती हूँ। जिस ख़ुशी के लिए मैं हज़ार गम सह सकती हूँ, मेरा ख्वाब कि मैं एक लेखक बनूँ। जिस असफलता केे डर से मुझे किसी दिन अपने कांच जैसे नाज़ुक सपनो को अपने दिल और दिमाग से फेंकने का फैसला लेना पड़ा था, उस गलत फैसले से मैं तब आज़ाद हो गयी थी।

मैं हमेशा सोचती थी कि भगवद गीता में कृष्णा ने अर्जुन से ये क्यों कहा कि कर्म करो, फल की चिंता छोड़ दो, क्योंकि मुझे तो आज तक यही लगता था कि हम बिना किसी वजह या किसी लाभ के कुछ काम ही क्यों करे पर मेरी सोच बदली उस नन्ही परी ने। उसकी किताबो के प्रति रूचि और कौतूहल ने मुझे अपना बचपन याद दिलाया, जिसमे मैं खुश थी तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं पढ़ और लिख रही थी, कुछ नया सीख और जान रही थी। उसके अलावा मुझे किसी और चीज़ की ज़रुरत ही नहीं थी, न प्रसिद्धि, न प्रशंसक न दौलत की।

अपने आज से इसलिए नाखुश थी क्योंकि ज़िन्दगी में उम्मीदों से मुँह मोड़ लिया था, अपने पहले प्यार को छोड़कर किसी स्टेटस और पैसे कमाने के लिए जीने लगी थी मैं। पर अब खुद को बदलने के लिए दिल में एक नयी उमंग सी दौड़ गयी थी, दोबारा कोशिश करने की, अपनी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ने की। घर की सबसे छोटी सदस्या, परिवार की नयी पीढ़ी में शामिल दीवा ने हम दादी पोती की पढ़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में कुछ इस तरह अपना योगदान दिया।
माँ की पुस्तको की अलमारी में दीवा ने अपनी नोवेल्स के लिए भी जगह बना ली है। उसके जन्मदिन पर उसे हैरी पॉटर ही गिफ्ट की इस बार, और अपने लिए भी एक अरसे के बाद एक नयी किताब खरीदी। उसे पढ़कर जो मुझे सुकून मिला शायद उस सुकून के सहारे अब मैं वापस जीना सीख लूँगी।

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