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संस्कार – निर्माण

सुन्दर संस्कारों का रोपन, बचपन में हो सहजारोपन।
अपनी संस्कृति अपनी भाषा, अपनी शक्ति का क्यूं हो गोपन।।
संस्कार है गति, प्रगति अौर समृदिॄ का प्रवेश द्वार।

संस्कारों की सम्पदा एक उत्कृष्ट संपदा है। इस संपदा के सामने सारे वैभव फीके है। संस्कार का शाब्दिक अर्थ लें ताे – अाचरण का सही अाकार। किसी भी बच्चे का , व्यक्ति का अाचरण, व्यवहार उसके संस्कार दर्शाता है। संस्काराे का बीजारोपण माँ से ही हाेता है। बच्चे की पहली शिक्षक माँ ही हाेती है। जब से बच्चा माँ के गर्भ में अाता है उसी समय से वह माँ के संस्कार ग्रहण करने लगता है। कहा भी जाता है गर्भवती स्त्री जिस तरह का अाचरण करेगी उसका असर बच्चे पर अाएगा। तो इसके लिए माताअों को जागरूक बनना पड़ेगा। उन्हे अपने रहन-सहन, खान-पान पर पूरा ध्यान देना हाेगा। कहते है ना “जैसा खाए अन्न, वैसा हाेवे मन”।

संस्कृति का भी पूरा प्रभाव पड़ता है बच्चे की परवरिश अौर हमारे अाचरण पर भी। अाजकल संस्कृति के नाम पर अपसंस्कृति पनप रही है। फैशन, टीवी, मीडिया, whatsapp, FB में लिप्त हाेती हमारी जिन्दगी अश्लीलता की ओर बढ़ रही है। एक छोटे से बच्चे को भी माेबाईल चाहिए। इन सबमें अच्छी बातें भी बहुत है लेकिन बाल मन, युवा मन अच्छाई नहीं बुराई की तरफ अाकर्षित हाे रहा है।

अाज के इस भौतिकतावादी चकाचौंध से हमारे संस्कार ही हमें बचा पाएंगे। अाजकल लगभग बच्चों की पढ़ाई अपने माता – पिता से दूर हाेकर ही होती है। इस समय संस्कार ही काम अाएंगे कि अकेला रहकर बच्चा कहीं गलत राह पर ना चला जाएं। देखादेखी की होड़ मेें संस्कार कहीं ना कहीं लुप्त होते जा रहे हैं। लेकिन हमें संस्कार भूलने नही है अौर ना ही अाने वाली पीढ़ी को भूलने देना है।

संस्कार – निर्माण के लिए गुरुदेव तुलसी ने एक बहुत ही सुन्दर अायाम दिया – “ज्ञानशाला” इसमें बच्चों को सद्संस्कार दिए जातें हैं। व्यक्तित्व विकास के साथ-साथ अाध्यात्मिक विकास भी करवाया जाता है| मेरा यह दावा है कि जाे बच्चा ज्ञानशाला में पढ़ा है वह कभी भटक नही सकता। बच्चों के साथ – साथ उनकी माताअों का भी व्यक्तित्व विकास हाेता है।

यह तो बात थी बच्चों की लेकिन संस्कारों की जहाँ बात अाती हैं कन्याअों को संस्कारी हाेना बहुत जरूरी हैं। कन्या एक घर की नहीं दो घर की शोभा बढ़ाती हैं। उसे कितने – कितने रिश्ते संभालने पड़ते हैं। सबसे पहले बेटी का, फिर बहू का, फिर माँ का और भी बहुत रिश्ते हैं जो वो बखूबी निभाती है। बहू और मां का रिश्ता ही पूरी माला को एक धागे में पिराेकर रखती हैं। सबसे पहले एक बहू काे अपनी सास के साथ सांमजस्य बनाकर रहना हाेगा। यदि बहू संस्कारी हाेगी तभी ताे वह सास सम्मान करेगी, अपने व्यवहार से परिवार को स्वर्ग सा सुन्दर बना सकेगी। वह संंस्कारी हाेगी तभी ताे अपने बच्चों को अच्छे संंस्कार दे पाएगी। सचमुच संस्कारों की डोर एक औरत के हाथ में हैं। यदि डोर ढ़ीली छोड़ दी तो पता नहीं कौन सी दिशा में चली जाए लेकिन अगर मजबूती से पकड़ रखा हैं तो वह कही नही जाएगी। कहने का मतलब हैं संस्कार हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। इस धरोहर को संभाल कर रखने के लिए कुछ बातें ध्यान में रखने की जरूरत हैं।

1. बचपन से बच्चाें के साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार करें।
2. यदि बच्चा गलती कर रहा है ताे कभी डांटिए मत,
मारिए मत उसे प्यार से समझाएं।
3. कभी – कभी लगता है डांटना सही है उस वक्त डांटे
लेकिन अपशब्द नहीं बाेलना चाहिए। गाली-गलौच
नही करना चाहिए।
4. यदि बच्चा जिद्द कर रहा हाे ताे तुंरत उसी वक्त उसकी
जिद्द पूरी मत करिए।
5. जब भी बच्चा स्कूल से अाए उसकाे प्यार सें पूछें अाज
क्या किया, किससे मिला अौर कहाँ गया।
6. बच्चे पर अपनी मर्जी नहीं थोपे। उसका स्वंय का
interest हाेता है उसमें उसे बढ़ावा दें। हाँ यदि
गलत है तो उसे समजाएं।
7. घरेलू झगड़े बच्चों के सामने नहीं लाने चाहिए।
8. राेजाना बड़ाे काे प्रणाम करना। अपने इष्ट की अाराधना
करना बच्चे काे शुरू से ही सिखाएं।
9. यदि अापके क्षेत्र में ज्ञानशाला हैं तो जरूर भेजे।
10. चारित्र अात्माअों के सान्निध्य में जरूर ले जाएं।

संस्कार निर्माण युवाअों की भी जिम्मेंदारी हैं। युवा वर्ग नशामुक्त बनें। युवा यदि नशा मुक्त हैं तब उसे अपना कैरियर बनाने अौर अाने वाली पीढ़ी काे संस्कारी बनाने में कोई नही रोक सकता। समाज में जितनी भी समस्याएं हैं संस्कारों से संबंधित वह अाधी से ज्यादा सुलझ जाएगी। मैं ताे कहती हूँ संस्कारों की धुरी पर हम सब टीके हैं। हमें स्वयं संस्कारी बनना हैं अौर अाने वाले भविष्य को संस्कारी बनाना हैं।

– मनीषा बाेथरा, इस्लामपुर

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